| देहरी
पर धरा दीप कहता है अब |
| एक आहट
को घर साथ ले आइये |
| मन-शिवाले
में में जो गूँजती ही रहे |
| गुनगुनाहट
को घर साथ ले आइये |
|
| कोई हो
जो बुहारे मेरा द्वार भी |
| कोई
आंगन की तुलसी को पानी तो दे |
| शर्ट के
टांक कर सारे टूटे बटन |
| सांस को
मेहन्दियों की निशानी तो दे |
| बस-यही, बस-यही,
बस-यही, बस-यही |
| इस 'त्रिया-हठ'
को घर साथ ले आइये |
|
| कोई
रोके मुझे, कोई टोके मुझे |
| ताकि
रातों में खुद को मिटा ना सकूं |
| कोई हो
जिसकी आंखों के आगे कभी |
| कुछ
कहीं भी, किसी से छुपा ना सकूं |
| श्रान्ति
दे कलांति को जो नयन-नीर से |
| उस
नदी-तट को घर ले आइये। |
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