देहरी पर धरा दीप - कुमार विश्वास


 

देहरी पर धरा दीप कहता है अब
एक आहट को घर साथ ले आइये
मन-शिवाले में में जो गूँजती ही रहे
गुनगुनाहट को घर साथ ले आइये

कोई हो जो बुहारे मेरा द्वार भी
कोई आंगन की तुलसी को पानी तो दे
शर्ट के टांक कर सारे टूटे बटन
सांस को मेहन्दियों की निशानी तो दे
बस-यही, बस-यही, बस-यही, बस-यही
इस 'त्रिया-हठ' को घर साथ ले आइये

कोई रोके मुझे, कोई टोके मुझे
ताकि रातों में खुद को मिटा ना सकूं
कोई हो जिसकी आंखों के आगे कभी
कुछ कहीं भी, किसी से छुपा ना सकूं
श्रान्ति दे कलांति को जो नयन-नीर से
उस नदी-तट को घर ले आइये।

 

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